इन तरीकों से बढ़ाइए मिर्च की खेती, जाने उत्पादन, संग्रह ,बाजार, बिक्री और मुनाफा के बारे में।

मिर्च की खेती
मिर्च की खेती

मिर्च, जिसे सुनते ही कुछ चटपटा सा याद आने लगता है| चाहे वो भेलपुरी हो, वड़ापाव, मसाला डोसा, पावभाजी या कोई भी माँसाहारी व्यंजन, बिना मिर्च के इसमें कोई जायका ही नहीं है | भारत में मिर्च का प्रयोग हरी मिर्च एवं सुखी मिर्च के रूप में मसालों में किया जाता है। इसे सब्जियों, अचार और चटनियों में डाला जाता है । आज इस लेख के माध्यम से हम मिर्ची की ही बात करेंगे। आइये जानते है मिर्ची से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, मिर्च की खेती, उत्पादन, संग्रह ,बाजार, बिक्री और खेती से मुनाफा कैसे कमाया जाए के बारे में।

मिर्च खाने से होने वाले कुछ अदभुद फायदे –

  • मधूमेह से राहत – शोधकर्ताओं के अनुसार मधुमेह एक जल्दी होने वाले रोगों में से एक है | रोजाना 2 हरी मिर्च का सेवन इस रोग को दूर कर देता हैं | एक गिलास पानी में रात को 2 हरी मिर्च बिना काटे डाल दें |सुबह उठकर खाली पेट शौच जाने के बाद इसे पी लें |सप्ताह में केवल एक बार इसे पीयें |4 सप्ताह तक इसे  पीने पर आपका मधुमेह सामान्य हो जायेगा |
  • कैंसर में भी लाभकारी – एक शोध में पाया गया है कि इसके सेवन से कैंसर की कोशिकाएं नष्ट होती हैं इसलिए यह कैंसर में भी लाभकारी है |
  • मोटापे में भी लाभकारी – रोजाना भोजन के साथ हरी मिर्च खाने से मोटापे पर भी काफी हद तक कमी आ जाती है |
  • लम्बाई बढाने में मददगार – किसी भी प्रकार का भोजन करने के साथ मिर्च का उपयोग करने पर इसका फायदा मिलता है| यह हमारी लम्बाई बढाने में मददगार है |
  • जले घाव पर असरदार – जले हुवे भाग पर यदि मिर्च को पानी के साथ पीसकर लगाएँ तो इससे घाव के असर को कम किया जा सकता है |
  • मलेरिया बुखार में लाभदायक – मलेरिया बुखार पर भी यह काफी लाभकारी है | बुखार आने से पहले इसे छीलकर बीज को निकालकर छिलके को अंगूठे में पहनने से बुखार आना ही बंद हो जाता है |
  • दमा रोग को रोकने में लाभकरी – दमा के मरीजों को यदि रोजाना सुबह एक चम्मच ताज़ा हरी मिर्च का रस पिलायें तो इससे फायदा होता है| अगर इस उपचार को शुरुवात में ही किया जाए तो इससे रोग स्थाई रूप से ही समाप्त हो जाता है |
  • एंटी बैक्टीरियल गुण -हरी मिर्च में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं जो कि‍सी भी प्रकार के संक्रमण से शरीर और त्वचा की रक्षा करते हैं। यह त्वचा के लिए एंटी इंफ्लेमेटरी मेडिसिन की तरह काम करती है ।

मिर्ची के विभिन्न वैरायटी

अब तक तो आप जान ही गए होंगे कि मिर्ची कितने सारे गुणों से भरी है| आइये अब पढ़ते है मिर्च के विभिन्न किस्मों के बारे में|

किस्मे  विशेषता 
पूसा ज्वाला इसके फल लंबे एवं तीखे तथा फसल शीघ्र तैयार होने वाली है। प्रति हैक्टर 15 से 20 क्विंटल मिर्च (सूखी) प्राप्त होती है।
कल्याणपुर चमन यह संकर किस्म है। इसकी फलियाँ लाला लंबी और तीखी होती है। इसकी पैदावार एक हैक्टेयर में 25 से 30 क्विंटल (सूखी) होती है।
कल्याणपुर चमत्कार यह संकर किस्म है। इसके फल लाल और तीखे होती हैं।
कल्याणपुर -1 215 दिन में तैयार हो जाती है तथा 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।
कल्याणपुर – 2 210 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल है।
सिंदूर 180 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टर 13.50 क्विंटल है।
आन्ध्र ज्योति पूरे भारत में उगाई जाती है। इस किस्म का उपज क्षमता प्रति हैक्टेयर 18 क्विंटल है।
भाग्य लक्ष्मी यह किस्म सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगायी जाती है। असिंचित क्षेत्र में 10-15 क्विंटल एवं सिंचित क्षेत्रों में 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती  है।
J(जे )– 218   इसकी उपज 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।
पंजाब लाल बहुवार्षीय किस्म है। यह मोजैक वायरस, कूकर्वित मोजैक वायरस के लिए प्रतिरोधी है| इसकी उपज क्षमता 47 क्विंटल/हे. है।
पूसा सदाबहार यह एक बारह मासी किस्म है जिनमें एक गुच्छे में 6-22 फल लगते हैं| इसमें साल में 2 से 3 फलन होता है| उपज 150 से 200 दिन में तैयार होती है। उपज 35 क्विंटल/है |
अन्य मुख्य किस्में सूर्य रेखा, जवाहर मिर्च- 218, एन.पी. – 46, ए. एम. डी. यू. -1. पंत सी. – 1, पंत सी. – 2, जे.सी.ए. – 154  (आचार के लिए) किरण एवं अपर्णा।

नोट: ध्यान देने वाली बात ये है कि यह केवल एक सीजन की फसल है | किसान भाई चाहें तो अपने खेती के अनुसार इसकी जितनी फसल लेना चाहें ले सकते हैं |

मिर्च की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु –

वैसे तो मिर्च की खेती भारत में पूरे वर्ष कर इसकी खेती से लाभ लिया जाता है |पर फिर भी हम जानते हैं कि इसके लिए उपयुक्त जलवायु कैसी होनी चाहिए |

  • अच्छी वृद्धि तथा उपज के लिए उष्णीय और उप उष्णीय जलवायु की आवश्यकता होती है।
  • अधिकांश किस्मों के लिए 70 से. तापमान अनुकूल होता है। प्रतिकूल तापमान तथा जल की कमी से कलियाँ, पुष्प एवं फल गिर जाते हैं।
  • मिर्च गर्म और आर्द्र जलवायु में भली-भाँति उगती है। लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है।
  • गर्म मौसम की फ़सल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप टल न गया हो।
  • बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डि सें. ग्रे. तापामन पर होता है। यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है, तो फलियाँ, फल व छोटे फल गिरने लगते हैं।
  • मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25-30 डि सें. ग्रे. है| तेज़ मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती है।
  • फूलते समय ओस गिरना या तेज़ वर्षा होना फ़सल के लिए नुकसानदेह होता है। इसके कारण फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं |

कैसे तयार करें मिर्ची के लिए अपना खेत

  • हालाँकि मिर्ची की खेती अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, फिर भी अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वों से युक्त दोमट मिट्टियाँ इसके लिए सर्वोत्तम होती हैं।
  • जहाँ फ़सल काल छोटा है, वहां बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टयों को प्राथमिकता दी जाती है। बरसाती फ़सल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए।
  • असिंचित क्षेत्रों की काली मिट्टियाँ भी काफी उपज देती है। 3-4 बार जुताई करके खेत की तैयारी करें।
  • जमीन पांच-छः बार जोत कर व पाटा फेर कर समतल कर ली जाती है। गोबर की सड़ी हुई खाद 300-400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए।
  • खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार की क्यारियां बना लेते हैं।

बीज का उपयोग कैसे करना चाहिए _

  • बीज खरीदने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी एकत्रित कर लें |
  • बीज एवं खाद सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थान से ही लें |
  • एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टेअर में रोपने के लिए पर्याप्त है ।

बुवाई का सही तरीका –

  • मैदानी और पहाड़ी ,दोनो ही इलाकों में मिर्ची की खेती के लिए सर्वोतम समय अप्रैल-जून तक का होता है।
  • बड़े फलों वाली क़िस्में मैदान में अगस्त से सितम्बर तक या उससे पूर्व जून-जुलाई में भी बोई जा सकती है।
  • पहाडों में इसे अप्रैल से मई के अन्त तक बोया जा सकता है।
  • उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जाता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती है।
  • इसके अलावा दूसरी फ़सल के लिए बुआई नवम्बर-दिसम्बर में की जाती है और फ़सल मार्च से मई तक ली जाती है ।

सिंचाई किस प्रकार की जानी चाहिए –

  • पहली सिंचाई बीज प्रतिरोपण के तुरन्त बाद की जाती है।  बाद में गर्म मौसम में हर पाँच-सात दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अन्तर पर फ़सल को सींचा जाता है।
  • शीतकालीन मौसम के मिर्च के खेती में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। सिंचाई की आवश्यकता पड़ने पर दो – तिहाई सिंचाई दिसंबर से फरवरी तक करनी पड़ती है|
  • ग्रीष्म कालीन मौसम की खेती में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। मिर्च की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए।

रोगों से बचाव-

आगे बढ़ते है| अब बात करते है मिर्ची की खेती में होने वाले कुछ सामान्य रोगों के पहचान एवं रोकथाम के बारे में|

रोग का नाम  रोग की पहचान  छुटकारा 
आर्द्रगलन रोग यह रोग ज्यादातर नर्सरी के पौधे में आता है। इस रोग में सतह, ज़मीन के पास धसे हुआ तना गलने लगता है तथा पौध मर जाती है। इस रोग से बचाने के लिए बुआई से पहले बीज का उपचार फफंदूनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए।

इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए ।

एन्थ्रेक्नोज रोग इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे, भूरे और काले रंग के घब्बे पड़ते है। इसके प्रभाव से पैदावार बहुत घट जाती है| इसके बचाव के लिए वीर एम-45 या बाविस्टन नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव  करना चाहिए।
मरोडिया लीफ कर्ल रोग यह मिर्च की एक भंयकर बीमारी है जो बरसात की फ़सल में ज्यादातर आता है। शुरू में पत्ते मुरझा जाते है।एवं वृद्धि रुक जाती है।

अगर इसके समय रहते नहीं नियंत्रण किया गया हो तो ये पैदावार को भारी नकुसान पहुँचाता है।

यह एक विषाणु रोग है जिसका कोई दवा द्धारा नित्रंयण नहीं किया जा सकता है|

यह रोग विषाणु, सफेद मक्खी से फैलता है। अतः इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही किया जा सकता है।

इसके नियंत्रण के लिए रोगयुक्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें तथा 15 दिन के अतंराल में कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि०ली० प्रति ली की दर से छिड़काव करें।

इस रोग की प्रतिरोधी क़िस्में जैसे-पूसा ज्वाला, पूसा सदाबाहर और पन्त सी-1 को लगाना चाहिए।

मौजेक रोग इस रोग में हल्के पीले रंग के घब्बे पत्तों पर पड़ जाते है।

बाद में पत्तियाँ पूरी तरह से पीली पड़ जाती है तथा वृद्धि रुक जाती है।

यह भी एक विषाणु रोग है जिसका नियंत्रण मरोडिया रोग की तरह ही है।
थ्रिप्स एवं एफिड ये कीट पत्तियों से रस चूसते है और उपज के लिए हानिकारक होते है। रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मि. ली.  प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इनका नियंत्रण किया जा सकता है।

कितनी होती है उपज-

सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 80-90 क्विंटल प्रति हेक्टेअर और सूखें फल की उपज 18-20 क्विंटल| हरी मिर्च की औसत उपज: 60 से 150 क्विंटल/हेक्टेयर

मिर्ची की खेती से होने वाली कमाई का आंकलन –

जैसा की हमने शुरू में बताया था मिर्ची एक नकदी फसल है | हरी मिर्च की खेती से किसान लागत की तुलना में दोगुनी कमाई कर सकते हैं। शर्त यह है कि वे कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करने के साथ ही फसल सुरक्षा के उचित उपाय करें। किसान भाई इस खेती को अपना कर काफी लाभ ले सकते हैं तथा अपनी सालाना आय को तीन गुना तक बढ़ा सकते हैं |

कहाँ और किसको बेचें –

मिर्च भारत के कोई राज्यों में बेचीं जाती है जैसे, राजस्थान मिर्च मंडी, दिल्ली का खारी बावली इसके लिए विश्व प्रसिद्ध जगह है | इसके आलावा आप चाहें तो अपने समीप के मसाले पिसाई करने वाले लोगों से संपर्क करके भी बेच सकते हैं | सुखी मिर्च से लेकर पीसी मिर्च सब बिकता है और नकद बिकता है |

आप सीधे तौर पर हरी मिर्च को उगाकर सब्जी मंडी में बेच सकते हैं या सीधे रिटेल में कस्टमर को भी बेच सकते हैं| कई इ कॉमर्स कम्पनी के माध्यम से भी आप इसको अपनी पैकिंग देकर बेच सकते हैं | फ्लिप्कार्ट, अमेज़न ,इंडिया मार्ट ,बिग बास्केट इसके उदहारण हैं|

आशा करते है मिर्ची की खेती से जुड़ी यह लेख आपको पसंद आयी होगी| अपने किसान भाईयों को जागरूक कर स्वरोज़गार मुहैया कराने हेतु शुरुवात की गयी इस मुहीम से जुड़े रहने के लिए हमें सब्सक्राइब करना न भूले| इसी तरह की जानकारी पाने के लिए बेबाक किसान कनेक्शन को अपना सहयोग दे| मिर्ची के उत्पादन से जुड़ी किसी भी तरह के समस्याओं के समाधान हेतु नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में कमेंट करना न भूले|

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