बिहार का यह गांव कभी “छोटी कलकत्ता” कहा जाता था!

उचौली
उचौली

बिहार का नाम जब भी लिया जाता है तो हमारे मानस पटल पर एक पिछड़े राज्य की तस्वीर उभरती है. एक ऐसा राज्य जहां उद्योग-धंधे हैं नहीं, लोग पलायन को विवश हैं. भारत के ही दूसरे राज्यों में बिहारी लोगों को पीटा जाता है, प्रताड़ित किया जाता है, भगाया जाता है. ऐसी स्थिति इसलिए है क्योंकि बिहार में काम का अभाव है. फैक्ट्रियां हैं नहीं जिससे कि लोगों को काम मिल सके. कुल मिलाके के मैन्युफैक्चरिंग से लेकर किसी भी प्रकार की कंपनियां बिहार में नहीं के बराबर है जिससे यहां की एक बड़ी आबादी को या तो पलायन करना पड़ता है या फिर खेती करना पड़ता है. कृषि बिहार में जीवकोपार्जन का मुख्य साधन हैं लेकिन जिनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है वो या तो मजूरी करते हैं या पलायन.

बात जब बिहार जैसे पिछड़े, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की होती है तो ऐसे में बिहार का यह गांव एक रोल मॉडल बनकर सामने आता था जहां की 90 प्रतिशत आबादी कृषि कार्य से खुशहाली की नई गाथा लिखते थे. लेकिन केंद्र व राज्य सरकार की किसान विरोधी नीतियों ने यहां के किसानों को भी बर्बाद कर दिया. दरभंगा जिले के हनुमाननगर प्रखंड में एक छोटा सा गांव है उचौली…कभी इसे “छोटी कलकत्ता” कहा जाता था. बाढ़ग्रस्त इलाका होने के बावजूद यहां के किसान अपनी सूझबूझ, कृषि की नवीन तकनीकों की सहायता से “किसानी” की एक नई परिभाषा गढ़ी थी. विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का उत्पादन यहाँ सालों भर होती थी. कम कृषि योग्य भूमि होने के बावजूद फलों, सब्जियों का उत्पादन यहां बड़े पैमाने पर होता था. कुल मिलाकर ग्रामवासी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे. पलायन के आंकड़े लगभग नगण्य थे. लेकिन कभी “छोटी कलकत्ता” के नाम से मशहूर इस गांव की हालत अब बहुत खराब है. सरकारों की किसान विरोधी नीतियाँ, खाद-उर्वरक, डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि ने किसानों की कमर तोड़ दी. कृषि उत्पादन में लागत इतनी अधिक हो जाती है कि लोग अब खेती करना ही नहीं चाहते. अब यहाँ के लोग मजूरी, पलायन करने को विवश हैं.

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