लालू प्रसाद को छोड़कर नीतीश कुमार की राह पर तेजस्वी

tejaswi yadav
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लालू प्रसाद के छोटे पुत्र व बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बगैर कोई संघर्ष किये अपने पिता के बदौलत उपमुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन नेता नहीं बन पाये. महागठबंधन की सरकार गिरने के बाद तेजस्वी यादव के पास विपक्ष के नेता के तौर पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी तो थी ही साथ ही एक जननेता बनने का बड़ा अवसर भी था/है. जैसा कि सर्वविदित है मुश्किलों में ही अवसर छुपे होते हैं. कम उम्र में उपमुख्यमंत्री बनना फिर साजिशन सत्ता से दूर कर दिया जाना, पिता के जेल जाने के बाद पार्टी और परिवार संभालने की बड़ी जिम्मेदारी तो थी ही लेकिन इन मुश्किलों में “पाने” के लिए तेजस्वी के पास और भी बहुत कुछ था, जिसे अभी तक तेजस्वी “गँवाते” हुए नज़र आ रहे हैं.

लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में विपक्षी नेता तेजस्वी यादव के शुरुआती फैसलों की बात करें तो जीतन राम मांझी को महागठबंधन में लाना व मनोज झा को राज्यसभा भेजना प्रमुख है. मांझी महादलित समुदाय से आते हैं साथ ही सवर्णों को आरक्षण देने के हिमायती भी हैं. मनोज झा कितने बड़े सामाजिक न्याय वाले व्यक्ति हैं सबको पता है….! मैंने तेजस्वी यादव के इन दोनों फैसलों का भरपुर विरोध किया था.

मेरे विरोध करने के कई कारण थे. पहले बात करते हैं मांझी की. जीतन मांझी अवसरवादी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं. उनका प्रायः बीजेपी से मनमुटाव सिर्फ स्वहित के लिए होता रहता था न कि समाज के लिए. दूसरी बात, सवर्ण आरक्षण के समर्थक हैं. एक तो सामान्य वालों को पहले से ही 51% (लगभग) का अघोषित आरक्षण मिल रहा है ऊपर से ये और देने के लिए उतावले हैं. तीसरी बात, इनके व्यक्तिगत स्वार्थ को मान लिया जाता तो ये अभी मोदी जी को दुबारा प्रधानमंत्री बना रहे होते. इनका सामाजिक न्याय स्वाहा…हो जाता. ऐसे लालची, बेसलेस व्यक्ति को साथ लेकर तेजस्वी सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ेंगे?

अब बात करते हैं मनोज झा की. लालू प्रसाद सामाजिक न्याय के ब्रांड के रूप में जाने जाते हैं. उनकी अनुपस्थिति में तेजस्वी यादव ने राजद कोटे से मनोज झा को राज्यसभा भेजा. मुझे नहीं मालूम कि मनोज कितने बड़े सोशल जस्टिस मानसिकता के हैं लेकिन सभी को मालूम है…ठीक है! दूसरी बात, खुद को दलितों, पिछड़ों की पार्टी कहने वाली आरजेडी और उसके नेता को पूरी पार्टी में एक भी आदमी दलित-पिछड़े समुदाय से नहीं मिला जिसे राज्यसभा भेजा जा सके? मेरे कहने का अर्थ ये नहीं कि तेजस्वी यादव ने सवर्ण को क्यों भेजा? या नहीं भेजना चाहिए था बल्कि ये उस समय की बात है जब बिहार से राज्यसभा की कुल 6 सीटों में से किसी भी पार्टी ने दलित-पिछड़े को एक भी सीट पर नहीं भेजा. कम से कम तेजस्वी यादव को तो भेजना चाहिए था दलित पिछड़े समुदाय से? आपने नहीं भेजा, फिर किस मुंह से दलित-पिछड़ों की बात करते हैं आप? सिर्फ वोट के लिए?

तेजस्वी यादव के हाल की राजनीतिक फैसलों की बात करें तो इन्होंने अपने कुनबे में उपेंद्र कुशवाहा को मिला लिया है. ये वही उपेंद्र कुशवाहा हैं जो साढ़े चार साल तक सामाजिक न्याय की बलि चढ़ा कर मंत्री पद की मलाई खाते रहे. अन्य कामों की बात तो छोड़िए इनका अपने विभाग का परफॉर्मेंस ज़ीरो है. इन्हें अपनी उपलब्धि जनता को बताने के बजाये दूसरे पर आरोप लगाने के लिए जाना जाता है….आप मंत्री थे…किसने आपका हाथ-पैर बांध दिया था कि आप काम नहीं कर पा रहे थे? और आप काम नहीं कर पा रहे थे तो इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे थे? भाजपा की डूबती नाव देखकर उपेंद्र कुशवाहा कूद गये. इसमें शहीद होने जैसी कोई बात नहीं है. इन्होंने कोई जनसरोकार के लिए नहीं बल्कि सीटों का तालमेल नहीं बन पाने के कारण एनडीए छोड़ा. कुछ सीटें मिल जाती तो इनका भी सामाजिक न्याय कबाड़खाने में पड़ा रहता और ये मोदी जी को 12वां अवतार घोषित कर दुबारा प्रधानमंत्री बना रहे होते. ऐसे सिद्धान्तहीन, लोभी व्यक्ति को साथ लेकर तेजस्वी सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ेंगे?? ये तो कभी भी मुख्यमंत्री पद की माँग कर महागठबंधन छोड़ सकते हैं. फिर हमारे वोटों का क्या होगा? वही होगा जो 2015 में हुआ था. वोट मिला लालू जी को, अभी सरकार भाजपा की है.

तेजस्वी यादव के उपरोक्त सभी फैसलों की बात करें तो ये अवसरवादी राजनीति है, वोट बैंक की राजनीति है. मांझी को महादलित वोट के लिए, मनोज झा को सवर्णों की नाराजगी दूर करने के लिए तथा उपेंद्र कुशवाहा को कुशवाहा समुदाय के वोट के लिए महागठबंधन में शामिल किया.

यहाँ एक बात और ध्यान दीजिये कि विपक्षी नेता के रूप में तेजस्वी ने कभी भी जनकल्याण को प्राथमिकता नहीं दिया. कभी रोजी रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, महंगाई जैसी जनसरोकार की बातों को गंभीरता से नहीं लिया, संघर्ष के रास्तों को छोड़ जातिगत समीकरण बिठाने में व्यस्त रहे. कभी आम आदमी की समस्याओं को लेकर गंभीर हुए भी तो सेलेक्टिव पॉइंट पर जहाँ से बैकवर्ड-फॉरवर्ड की लकीरें आसानी से खींची जा सके. जनता से दूर रहने वाले एक ऐसे नेता के रूप में खुद को स्थापित कर लिया जो स्वहित को प्राथमिकता देता हो. आम जनमानस को टटोलने व उसके करीब रहने में नाकाम रहे.

कुल मिलाकर तेजस्वी यादव ने संघर्ष के रास्तों को छोड़कर, जोड़तोड़ व अवसरवादिता की राजनीति की. कुर्सी तक पहुंचने वाले हर तिकड़मबाजी को अपनाया जो नीतीश कुमार करते रहे हैं. सिद्धान्त व समाज से दूर जातिगत समीकरण की राजनीति की.

आप सभी जानते हैं कि लालू प्रसाद का रास्ता सिद्धांत व संघर्षों से होकर गुजरता है जबकि नीतीश कुमार तिकड़मबाजी के लिए प्रसिद्ध हैं.

तेजस्वी ने लालू प्रसाद को छोड़कर नीतीश कुमार के रास्ते पर चलना पसंद किया लेकिन क्या वो, नीतीश कुमार भी बन पायेंगे??? बन पायेंगे या नहीं…वो भी बतायेंगे आपको हम..अगले अंक में!

विजय कुमार रॉय स्वतंत्र टिप्पणीकार

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