हम सभी ने बचपन से ही एक कहावत सुनी है की भाई “ जिसका बन्दर वही नचावे” | आज इस समाज में अपनी जीविका हेतु लोग बहुत सारे रास्ते अपनाते हैं | कहने को तो लोग मेहनत एवं लगन से कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर सकते हैं परन्तु ये रास्ता थोड़ा लम्बा जरुर हो जाता है | आज भागमभाग भरे इस संसार में आखिर इतना टाइम किसके पास है भाई जो इतना सब्र करे |

शॉर्टकट के इसी खेल ने आज हमारे समाज में लोभ को जन्म दिया तो वहीँ दुसरी ओर हमारे सामान में मिलावट को | मिलावट की इस दुनिया में अगर कोई चीज़ इसका सबसे बड़ा शिकार हुई है तो वो है “ दूध” जी हाँ…. दूध, कहने को तो इस संतुलित आहार एवं जीवनदायनी दूध के बहुत फायदे हैं परन्तु मिलावट की इस मार ने दूध को भी नहीं बक्सा | दूध का एक गिलास ख़त्म करने के बाद अनायास ही मेरे मन में ये सवाल उठ पड़ा की आखिर जो दूध मैं पी रहा हूँ वो शुद्ध भी है की नहीं?

शुद्ध दूध की तलास में जब मै खटाल पहुँचा तो वहाँ कुछ दूध-वालो ने मेरा जमकर स्वागत किया | पूछने पर पता चला की ग्राहकों की मांग एवं कीमत पर हम दूध में थोडा-बहुत पानी मिला देते हैं ताकि ग्राहक भी कीमत से संतुष्ट रहे एवं हमे भी हमारा मेहनताना मिल जाये | एक लीटर दूध भरने के बाद जाते-जाते जब मैंने मजाकिया लहजे में ये व्यंग किया की “ भैया ये दूध शुद्ध कैसे रही, इसमें तो आपने पानी मिलाया है” तब वहाँ से मुझे जवाब मिला भैया हम “ शुद्ध गाय” का दूध बेचते हैं “गाय का शुद्ध” दूध नहीं बेचते और फिर गाय तो हमेसा शुद्ध ही होती है |

मुझे मेरा जवाब मिल चूका था और ये भी पता चल गया था की भाई “ जिसका बन्दर वही नचावे”. अब दूध उनका तो तरीके भी उन्ही के होंगे न भाई |

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