लालू प्रसाद को महापुरुष क्यों मानती है बिहार की जनता?

Lalu Yadav
Lalu Yadav

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर ढूंढने से पहले भारतीय सामाजिक स्थिति को समझना बहुत जरूरी हो जाता है. बिना सामाजिक व्यवस्था को समझे आप सामाजिक परिवर्तनों को नहीं समझ सकते. किसी भी समाज मे हुए परिवर्तनों के लिए वहां के इतिहास, वर्तमान एवं भविष्य का तुलनात्मक विश्लेषण करना आवश्यक माना जाता है. बिहार, जो कि सामाजिक परिवर्तनों की प्रयोग स्थली रही है, इसके विकास के क्रम का प्रत्येक काल ऐतिहासिक रहा है. प्राचीन काल से ही यह महापुरुषों की धरती रही है जिनके असाधारण उपलब्धियों, सामाजिक योगदानों से आपलोग भलीभांति परिचित हैं.

लालू जी के बारे में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं. जैसा कि हमेशा से होता रहा है. सौ फीसदी पॉजिटिव रेटिंग किसी भी महानायक को, किसी भी समय में, नहीं मिली. तो ये सामान्य बात है….लोग उंगली उठाने वाले भी होते हैं. मेरे जैसे एक सामान्य नागरिक, शिक्षित नौजवान से जब पूछा जाता है कि आप लालू जी से क्यों प्रभावित हैं तो उनको जवाब देने से पहले हमारे मानस पटल पर, सामने वाले के लिए कई सारे प्रश्न तैरने लगते हैं. जैसे कि प्रश्नकर्ता की जिज्ञासा ? उसे वाकई लालू प्रसाद के बारे में जानने की जिज्ञासा है या पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता है? उनका बौद्धिक, सामाजिक स्तर क्या है;………….? मेरे कहने का तात्पर्य है कि इस संदर्भ में जवाब देने से पहले प्रश्नकर्ता को जज करना आवश्यक हो जाता है. ऐसा नहीं कि प्रश्नकर्ता को जज करना जरूरी है बल्कि यहां कि सामाजिक मानसिकता हमें ऐसा करने को विवश करती है.

अब बात करते हैं लालू जी से प्रभावित होने की. हम लालू जी को अपना आदर्श, महानायक, हीरो क्यों मानते हैं?
इसका जवाब ढूंढने के लिए आपको प्राचीन बिहार से लेकर वर्तमान बिहार तक का अध्ययन करना पड़ेगा. आधुनिक बिहार में भी आज़ादी से पहले, आज़ादी के बाद से नब्बे तक का बिहार और फिर नब्बे के बाद के बिहार में तुलनात्मक विश्लेषण करना पड़ेगा. सिर्फ बिहार ही नहीं, देशभर में लालू इफेक्ट को समझना पड़ेगा. ईमानदारी पूर्वक विश्लेषण करेंगे तब आपको पता चलेगा कि लालू प्रसाद, मनुतंत्र के तमाम षड्यंत्रों से अप्रभावित होते हुए कैसे महापुरुष बन गये!!!

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आज़ादी के बाद 90 तक और 90 के बाद के बिहार में हुए सामाजिक परिवर्तन को देखिये….आपको अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिलेंगे! इस बदलाव ने सम्पूर्ण भारत को प्रभावित किया. मण्डल कमीशन ने तो इस बदलाव की बयार में चार चांद लगाने का काम किया!

बोलने को लोग बोल जाते हैं कि लालू जी ने उपेक्षितों, वंचितों को आवाज देने के अलावे क्या किया? मेरा मानना है कि सभी अधिकारों का आधार आवाज ही होता है. यही वो शक्ति है जिनसे आप सबकुछ प्राप्त कर सकते हैं. लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं.आवाज ही सबकुछ होता है
कभी पुलिस की वर्दी-टोपी देखकर छुप जाने वाले लोग पुलिस से सवाल करने लगे कि मेरे नाम का वारंट है क्या? सरकारी कार्यालयों में पूछने लगे मेरा काम क्यों नहीं हुआ? खटिया पर न बैठ पाने वाले लोग संसद में बैठने लगे. नौकरी में हिस्सेदारी मिलनी शुरू हो गई. कभी जानवरों से भी बदतर ज़िंदगी जीने वाले लोग मुख्यधारा में आ गये. सदियों से उपेक्षित वर्गों के लोगों ने सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया! लोगों की मानसिकता, आर्थिक स्तर, शैक्षिक स्तर, सामजिक स्तर में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला!

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बाकी ,लिखने के लिए तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है लालू जी के बारे में और लिखा भी जायेगा! उनके अभूतपूर्व योगदानों के बारे में हम अपने अगले अंक में आपको बतायेंगे कि सामाजिक विकास के क्रम में, किस क्षेत्र में उन्होंने कितना योगदान दिया.

लेखक के बारे में: विजय कुमार राय एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, समाज के विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात बेबाक़ी से रखते हैं।

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