पर्यावरण के लिए अमृता देवी का बलिदान

    पर्यावरण के लिए अमृता देवी का बलिदान
    पर्यावरण के लिए अमृता देवी का बलिदान

    रेगिस्तान में चारो ओर चमकती रेत और बिच में हरे-हरे खेजरी के पेड़, गाँव की सुन्दरता को चार चाँद लगा रहे थे | इन्ही खेजरी पेड़ो के कारण यह गाँव खेज्राली के नाम से जाना जाता था | खेज्राली गाँव के सभी लोग पर्यावरण से बहुत प्यार करते थे | वे गाँव के जानवरों और पेड़- पौधों का इस तरह ध्यान रखते थे, जैसे कोई अपने बच्चो का रखता है | वे प्रक्रति के पुजारी थे|

    बिश्नोई जाती की स्थापना गुरुजम्बेश्वरी जी ने की थी | उन्होंने बिश्नोई के 26 सिद्धांतो का पालन करने को कहा था | उन्होंने बिश्नोइयो को शिक्षा दी की जानवरों और पेड़ो की रक्षा करो | उन्ही की शिक्षा का प्रभाव था की बिश्नोई अपने पेड़ो और जानवरों की जी-जान से रक्षा करते थे|

    सन 1760 की बात है, उन दिनों जोधपुर के महाराजा अभय सिंह का नया महल बना रहा था | महल के लिए बहुत-सी इमारती लकड़ी की आवशकता थी | रेगिस्तान में लकड़ी की कमी थी | राजा के मंत्रियो में विचार विमर्श करके कहा, “ हमें खेजराली गाँव से लकड़ी लेनी चाहिए, वहा खेजरी के बहुत से पेड़ है | राजा के मंत्रियो ने उन्हें काटकर ले आए, तो राजा का महल जल्दी ही बन जायेगा |”

    एक दोपहर को , जब खेजरालीगाँव के सब लोग घरो में आराम कर रहे थे, राजा के सिपाहियों ने आकर पेड़ो को काटना शुरू कर दिया | अमृता देवी और उनकी तीन बेटीयाँ, जो उस समय घर पर ही थी, कुल्हाडियो का शोर सुनकर दौड़ती हुए आई घर से बहार आ गई | जब उन्होंने सिपाहियों को पेड़ काटते देखा, तो उनके चहरे पीले पड़ गए | अमृता देवी दौड़कर सिपाहियों के सामने आ गई और नम्रतापूर्वक उनसे कहने लगी, “ ये वृछ हमारे पूजनीय है |  हम इनकी पूजा करते है | कृपया इन्ह मत काटिए|” परन्तु सिपाही उनकी बात कहा मानाने वाले थे | वे लोग आगे बढ़ते हुए बोले, “ हट जाओ हमारे सामने से | हम ये पेड़ काटने आए है और काटकर ही ले जायेंगे | हमें राजा के महल के लिए लकड़ी चाहिये |”

    अमृता देवी दुखी होकर बोली,” क्या राजा का महल और उसकी सजावट लोगो के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है? ये पेड़ हमारे जीवन है, इसीलिए हम इनकी पूजते है |” महाराज के सिपाही गरजते हुए बोले, “ हमें राजा का आदेस है और हम उसका पालन अवश्य करेंगे | “ यह कहकर उन्होंने पेड़ काटने लिए अपनी कुल्हाड़िया ऊपर उठा ली |

    अमृता देवी ने उनसे भी अधिक गरजकर कहा, “ रुको ! अगर आप को राजा के आदेश का पालन करना है, तो हम भी अपने गुरु जम्बेशवर जी के सिद्धांत को तोड़ नहीं सकते | उन्होंने जानवरों की हत्या और पेड़ो को कटाने पर प्रतिबन्ध लगाया है | हम बिश्नोई है और हमारा कर्त्तव्य इन पेड़ो की रक्षा करना है | इसके लिए अगर हमें अपनी जान भी देना पड़े, तो हम भी पीछे नहीं हटेंगे |

    लेकिन राजा के सिपाहियों के कानो पर जू तक नहीं रेंगी | उन्होंने अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए| अमृता देवी और उनकी पुत्रिया पेड़ो के आगे कड़ी हो गई, जैसे माताए अपने बच्चो की रक्षा के लिए आगे आ गई हो | सिपाहियों के सर पर तो जैसे क्रूरता सवार थी | पेड़ो के साथ उन्होंने अमृता देवी और उनकी पुत्रियों को भी काट दिया | लगभग 363 बिश्नोइयो की जाने चली गई, परन्तु राजा के सिपाही पीछे नहीं हटे |

    खेजराली और आस-पास के सभी गांवों में हाहाकार मच गया | जब राजा अभय सिंह को बिश्नोइयो के इस बलिदान का पता चला, तो उसे बहुत दुःख हुआ | उसने आदेश दिया कि कोई भी पेड़ न काटा जाए | यही नहीं राजा ने स्वयं जाकर सिपाहियों की निर्दयता के लिए, बिश्नोइयो से क्षमा मांगी | उन्हें अस्वासन दिया कि अब कभी भी कोई इतना भयानक अपराध नहीं करेगा | महाराज अभय सिंह ने आदेश निकला, जिसके आधार पर अब जानवरों की हत्या और वृछ के काटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया | यह आदेश राजा के परिवार पर भी लागु होता था | उस आदेश के अनुसार जो कोई भी इश कानून का उलंघन करेगा, उसे सजा दी जाएगी और जुर्माना भी होगा |

    अमृता देवी और उनकी पुत्रियों का बलिदान बेकार नहीं गया | उन्होंने पुरे समाज और देश के सामने एक उदहारण रखा कि महिलाये में भी बहुत शक्ति है | वे चाहे तो कुछ भी कर सकती है | यह उन्ही की शक्ति थी, जिसके सामने महाराजा अभय सिंह को झुकना पड़ा | बिश्नोइयो के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी |

    बिश्नोयो का पेड़ो के प्रति प्रेम, आज भी उनके रीती-रिवाजो में स्पस्ट दीखता है |

    वे मृतकों को जलाते नहीं है, बल्कि धरती के अन्दर दफनाते है | यह सब केवल इसलिए की दाह-संस्कार के लिए लकड़ी का प्रयोग न करना पड़े और पेड़ो को भी काटना न पड़े | बिश्नोई लकडहारे भी लकड़ी का सामन बनाने के लिए पेड़ नहीं काटते | जब पेड़ तूफानी हवाओ से गिर जाते है, या सुख जाते है, तभी उस लकड़ी का उपयोग करते है |

     

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    Amrita Devi ka Balidaan
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    रेगिस्तान में चारो ओर चमकती रेत और बिच में हरे-हरे खेजरी के पेड़, गाँव की सुन्दरता को चार चाँद लगा रहे थे | इन्ही खेजरी पेड़ो के कारण यह गाँव खेज्राली के नाम से जाना जाता था | खेज्राली गाँव के सभी लोग पर्यावरण से बहुत प्यार करते थे |
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