संसार को जितना कठिन है प्रसन्न करना, उतना ईश्वरों को नहीं |

    संसार को जितना कठिन है प्रसन्न करना उतना ईश्वरों को नहीं
    संसार को जितना कठिन है प्रसन्न करना उतना ईश्वरों को नहीं

    आप कोई भी अच्छे काम करें लोग उसमे अच्छाई के जगह बुराई ही निकालते हैं ;  इसलिए उस ओर ध्यान न देते हुए स्वयंको जो सही लगता है, वैसा आचरण करने से ही सफलता हांसिल होता है ।

    एक बार एक पिता  और पुत्र एक घोडा को साथ लेकर जा रहे थे ।

    पुत्रने पितासे कहा ‘‘आप घोडेपर बैठीये, मैं पैदल चलता हूं ।’’ पिता घोडेपर बैठकर जाने लगे ।

    रास्ते  में जाते समय लोग देखकर कहने लगे, ‘‘बाप निर्दयी है । पुत्रको पैदल धूप में चला रहा है तथा स्वयं आराम से घोडेपर बैठे जा रहा है । यह  बात सुनकर पिताने पुत्रको घोडेपर बैठा दिया तथा स्वयं पैदल चलने लगे ।

    आगे कुछ लोग मिले तो, वे बोले, ‘‘देखो पुत्र कितना बेसर्म है ! ख़ुद युवा होकर भी घोडे के उपर पर बैठा है तथा पिताको पैदल चला रहा है ।’’ यह सुनकर दोनों घोडेपर बैठकर  जाने लगे।

    आगे जानेपर लोग बोले, ‘‘ये दोनों ही कठोर समान हैं तथा छोटेसे घोडेपर बैठे हैं । घोडा इनके वजनसे दब जाएगा ।’’ यह सुनकर दोनों पैदल ही चलने लगे ।

    कुछ दूर चलनेपर लोगों लोगों की आवाजें फिर से सुनाई दी , ‘‘देखो कितने बेवकुफ हैं ये दोनों ? घोडा साथमें है, फिर भी पैदल ही चल रहे हैं हाहाहा ।’’

    कहने का तात्पर्य यह है  : कुछ भी करें आप, लोग आलोचना ही करते हैं; इसलिए लोगोंको क्या अच्छा लगता है क्या बुरा लगता है, इसपे ध्यान देने से अच्छा है की भगवान को क्या अच्छा लगता है, इसपे  ध्यान दीजिए। पुरे संसारको जितना प्रसन्न करना कठिन है, इससे कई गुन्ना ईश्वरको प्रसन्न करना आसान है ।

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    संसार को जितना कठिन है प्रसन्न करना, उतना ईश्वरों को नहीं
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    कुछ भी करें आप, लोग आलोचना ही करते हैं; इसलिए लोगों को क्या अच्छा लगता है क्या बुरा लगता है, इसपे ध्यान देने से अच्छा है की भगवान को क्या अच्छा लगता है, इसपे ध्यान दीजिए।
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